प्रत्येक मनुष्य की भांति मेरा जीवन भी उपलब्धियों, असफलताओं, आशाओं, निराशाओं, ज्ञान व अज्ञान का इन्द्रधनुष है| किंतु यदि मुझे इन विविध रंगों में से किसी एक को चुनना हो तो मैं निस्संदेह साधनाओं के क्षेत्र में अपने अप्रत्याशित पदार्पण को चुनुँगा जब संसार के श्रेष्ठतम गुरु व सिद्धाश्रम के संचालक परमहँस स्वामी निखिलेश्वरानंद ने मुझे शिष्यरूप में स्वीकार किया था| जिनके दर्शनमात्र से निर्विकल्प समाधि के राजद्वार खुल जायें उनका सानिध्य प्राप्त करना पूर्वजन्मों की कठोर तपस्या का परिणाम ही हो सकता है|

जिस प्राणी के ऐसे गुरु हों न तो वह स्वयं साधारण हो सकता है, न उसके कर्त्तव्य| संभव है कि स्वयं ही स्वयं की उपलब्धियों का उल्लेख करना तथा देवाधिदेव महादेव द्वारा रचित साधनाओं के विषय में अपने विचार व्यक्त करना अंहकारमूलक व स्वार्थप्रेरित प्रतीत हो, किन्तु ऐसा न करना गुरु के स्नेह व अनुग्रह का अवमूल्यन होगा| अतः साधारण मनुष्यों के मन में सदैव निवास करने वाली तथा पुण्यों का दावानल की भांति विनाश करने वाली आदिभावना ईर्ष्या का भय त्यागते हुए मैं अपने गुरु के ज्ञान का प्रसार इस विश्वव्यापी मकड़जाल पर कर रहा हूँ| गुरुदेव सदा की भांति मुझे आशीर्वाद दें|