यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः |
न च विद्याऽऽगमः कश्चित् तं देशं परिवर्जयेत् ||
जिस देश में सम्मान नहीं, आजीविका के साधन नहीं, बंधू-बांधव अर्थात् परिवार नहीं और विद्या प्राप्त कराने के साधन नहीं हों, वहां कभी नहीं रहना चाहिए|
साधना, सिद्धि व जीवन पर मेरे विचार
यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः |
न च विद्याऽऽगमः कश्चित् तं देशं परिवर्जयेत् ||
जिस देश में सम्मान नहीं, आजीविका के साधन नहीं, बंधू-बांधव अर्थात् परिवार नहीं और विद्या प्राप्त कराने के साधन नहीं हों, वहां कभी नहीं रहना चाहिए|
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