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अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते |
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ||
यह आत्मा अव्यक्त है, अचिन्त्य है और विकार रहित है| हे अर्जुन! इस आत्मा को इस प्रकार जानकर तेरा शोक करना उचित नहीं है|
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २ श्लोक २५
वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम् |
रूपशीलां न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ||
बुद्धिमान व्यक्ति को अच्छे कुल में जन्मी कुरूप कन्या से भी विवाह कर लेना चाहिए, परन्तु अच्छे रूप वाली नीच कुल की कन्या से विवाह नहीं करना चाहिए क्योंकि विवाह – सम्बन्ध सामान कुल में ही श्रेष्ठ होता है|
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च |
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ||
यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निस्संदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर और सनातन है|
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २ श्लोक २४
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते |
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव च ||
जो अपने निश्चित कर्मों अथवा वस्तु का त्याग करके, अनिश्चित की चिंता करता है, उसका अनिश्चित लक्ष्य तो नष्ट होता ही है, निश्चित भी नष्ट हो जाता है|
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः |
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ||
इस आत्मा को शास्त्र नहीं काट सकते, आग नहीं जला सकती, जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकती|
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २ श्लोक २३
आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे |
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ||
बीमारी में, विपत्तिकाल में, अकाल के समय, शत्रुओं से दुःख पाने या आक्रमण होने पर, राजदरबार में और श्मशान भूमि में जो साथ रहता है, वही सच्चा बन्धु है|
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ||
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर नए शरीरों को प्राप्त होता है|
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २ श्लोक २२
प्रतिदिन प्रातःकाल सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् का पाठ कराने से सभी प्रकार के विघ्न – बाधा नष्ट हो जाते हैं व परम सिद्धि प्राप्त होती है| इसके पाठ से काम – क्रोध का मारण, इष्टदेव का मोहन, मन का वशीकरण, इन्द्रियों की विषय – वासनाओं का स्तम्भन और मोक्ष प्राप्ति हेतु उच्चाटन आदि कार्य सफल होते हैं|
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे || ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ||
नमस्ते रूद्ररुपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि |
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि || १ ||
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि || २ ||
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे |
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका || ३ ||
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते |
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी || ४ ||
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणि || ५ ||
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी |
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु || ६ ||
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी |
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः || ७ ||
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा |
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा || ८ ||
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्र सिद्धं कुरुष्व मे || ९ ||
जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनाऽऽगमे |
मित्रं चाऽऽपत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ||
नौकरों की बाहर भेजनें पर, संकट के समय भाई-बंधुओं की, विपत्ति के समय मित्रों की और धन के नष्ट हो जाने पर स्त्री की परीक्षा करनी चाहिए|
यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः |
न च विद्याऽऽगमः कश्चित् तं देशं परिवर्जयेत् ||
जिस देश में सम्मान नहीं, आजीविका के साधन नहीं, बंधू-बांधव अर्थात् परिवार नहीं और विद्या प्राप्त कराने के साधन नहीं हों, वहां कभी नहीं रहना चाहिए|
