कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् |
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ||
हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग और कीर्ति देनेवाला है|
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्वय्युपपद्यते |
क्षुद्रं ह्रदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ||
अतः हे अर्जुन! नपुंसकता को प्राप्त न हो, यह उचित नहीं है| हे परंतप! हृदय की दुर्बलताओं को त्याग कर युद्ध के लिए खड़ा हो जा|
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २ श्लोक २ व ३

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