उपेक्ष्य समाये कार्ये, भग्ने चिंता निरार्थका |
निर्गने सलिले तत्र, सेतु बंधो निरर्थकः ||

जिस प्रकार पानी के बह जाने पर मेड़ बनाना निरर्थक है, उसी प्रकार समय पर काम नहीं करने पर बिगड़े हुए काम के लिए चिंता करने से भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता|

सौजन्य – चन्दामामा जून १९८४