भीतिदः सुजनोपि स्यात्, यदि दुर्जन सेवितः |
पन्नग स्थाश्रयमं वृक्षं, चंदन कः समाश्रयेत ||
दुर्जन को आश्रय देने वाले सज्जन को देख लोग भयभीत हो जाते हैं| चंदन वृक्ष सर्प को आश्रय देता है, इसलिए उसकी छाया में कोई भी विश्राम नहीं करता|
सौजन्य – चन्दामामा, जनवरी १९८४

No comments yet
Comments feed for this article