वर्त्तमान समय में व्यापक किंतु गूढ़ अर्थ वाली रहस्यमयी तंत्र विद्या अभीष्ट सिद्धि के सर्वाधिक प्रभावी उपाय के रूप में अपनी लोकप्रियता के चरम पर है| दुर्भाग्यवश, जनसामान्य के इस ह्रदय परिवर्तन का कारण सनातन धर्म के प्रति सम्मान अथवा ज्ञान प्राप्ति की इच्छा नहीं अपितु बिना श्रम के सर्वस्व हस्तगत कर लेने की लिप्सा है| लालसा, मूर्खता, भ्रम व अंधश्रद्धा के अन्धकार में वास्तविकता लुप्तप्राय ही है| चमत्कार का आकर्षण सत्य से अधिक होता है इसलिए मदारी गुरुपद पर आसीन हैं और सदगुरु की बारम्बार अग्नि परीक्षा ली जाती है|
प्रत्येक पुत्र का कर्त्तव्य होता है कि वह अपने पिता से श्रेष्ठ बने| प्रत्येक शिष्य का धर्म होता है कि वह अपने गुरु से उच्च स्थान प्राप्त करे| अज्ञान, अधर्म व अविवेक के विष से बंजर हो चुकी भारतवर्ष की पवित्र भूमि में ज्ञान के बीजारोपण के लिए अनिवार्य है कि प्रत्येक पुत्र अपने कर्तव्य का पालन करें| रसातल की ओर जाते इस राष्ट्र की अधोगति रोकने हेतु आवश्यकता है ऐसे शिष्यों की जो अपने धर्म का पालन करें|
कोई और करे न करे, मैं उग्र साधनाओं की भीषण अग्नि में दमक कर अपने कर्तव्य तथा धर्म का पालन अवश्य करूंगा| साथ ही मैं अपने बधुओं, भगिनियों, मित्रों, सखियों को प्रेरित करने का हर संभव प्रयास करूंगा| माता, पिता व गुरु के आशीर्वादरूपी दिव्यास्त्रों से सज्जित हो मैं अपने उद्देश्यप्राप्ति हेतु इस चिठ्ठे का शुभारम्भ करता हूँ|

2 comments
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August 2, 2008 at 4:19 pm
राजेंद्र माहेश्वरी
दैवी शक्तियों के अवतरण के लिए पहली शर्त है- साधक की पात्रता, पवित्रता और प्रामाणिकता ।
Swagatam.
August 2, 2008 at 4:59 pm
Nikhilashish
सत्य कहा आपने, राजेन्द्रजी|
धन्यवाद|