सद्यश्छिन्नशिरः कृपाणमभयं हस्तैर्वरंबिभ्रतीँ
घोरास्यां शिरसांस्त्रजासुरुचिरामुन्मुक्तकेशावलिम ||
स्रुक्कयस्रुक्प्रवहांश्मशाननिलयां श्रुत्योः शवालंकृतिमं
श्यामांगीं कृतमेखालां शवकरैर्देविभजे कालिकां ||
दक्षिण कालिका देवी कराल मुख वाली हैं| उनके केश खुले हुए हैं| गले में मुण्डमाला है| उनकी चार भुजाएं हैं| बाएँ निचले हस्त में तुंरत कटा मुण्ड है तथा ऊपरी हस्त में अभय मुद्रा है| दायें निचले हस्त में वरद मुद्रा तथा ऊपरी हस्त में खड्ग है| उनके होठों के किनारों से रक्त चू रहा है| कानों में दो शव शिशु आभूषण के रूप में लटक रहे हैं| कमर में शवहस्त निर्मित करधनी शोभायमान है| उनका श्याम वर्ण है तथा वे सदा श्मशान में रहती हैं| ऐसी दक्षिण कालिका देवी का मैं ध्यान करता हूँ|

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