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अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ||

हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है| परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं, उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते|

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २ श्लोक ११

शरदि न वर्षति गर्जति वर्षति वर्षासु निस्वनो मेघः |
नीचो वदति न कुरुते न वदति सुजनः करोत्येव ||

शरदकाल का मेघ गरजता है, पर बरसता नहीं| वर्षाऋतु का मेघ गरजे बगैर बरसता है| इसी प्रकार नीच व्यक्ति आश्वासन देकर चुप रह जाता है और सज्जन व्यक्ति कहे बिना उत्तम कार्य करके दिखाता है|

सौजन्य – चन्दामामा दिसम्बर १९८२

विश्वव्यापकवारिमध्यविलसच्छ्वेताम्बुजन्मस्थितां
कर्त्रीँखड्गकपालनीलनलिनै राजत्करां नीलभां |
कांचीकुण्डलहारकंकणलसत्केयुरमंजीर
तामाप्तैर्नागवरैर्विभुषततनूमारक्तनेत्रत्रयां ||
पिंगोग्रैकजटां लसत्सुरसनां दंष्ट्राकरालाननां
चर्मद्वैपिवरंकटौ विदधतीँ श्वेतास्थिपट्टालिकां |
अक्षोभ्येण विराजमानशिरसं स्मेराननां भोरुहां तारां
शावहृदासनां दृढकुचामंबांत्रिलौक्याःस्मरेत ||

विश्वव्यापक जल के मध्य में श्वेत कमल पर अवस्थित हैं| दाहिने हाथों में खड्ग एवं नील कमल तथा बांये हाथों में कर्तरिका एवं कपाल धारण किए हुए हैं| नीलवर्ण जैसी आभामय कान्तिवाली तथा कांची, कुण्डल, हार एवं केयूर आदि आभूषणों से सुशोभित हैं| सुंदर नागों से विभूषित एवं लाल – लाल तीन नेत्रों से शोभायमान हैं| सर पर पिंगल वर्ण की एक जटा है| चंचल जिव्हा है| उनकी दंतपंक्ति मुख विकराल हैं| कमर में व्याघ्रचर्म धारण किए हुए हैं| माथे पर श्वेतास्थिपट्टिका धारण किए हैं| शिर पर नागरुपधारी अक्षोभ्य ऋषि विराजमान हैं| अपने भावावेश में हास्य वदन वाली हैं| शव के ह्रदय पर बैठी हूई, कठोर स्तन वाली एवं तीनों लोकों की स्वामिनी भगवती तारा का स्मरण करना चाहिए|

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् |
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ||

हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग और कीर्ति देनेवाला है|

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्वय्युपपद्यते |
क्षुद्रं ह्रदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ||

अतः हे अर्जुन! नपुंसकता को प्राप्त न हो, यह उचित नहीं है| हे परंतप! हृदय की दुर्बलताओं को त्याग कर युद्ध के लिए खड़ा हो जा|

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २ श्लोक २ व ३

मातापितृभ्यां जामात्राभ्रात्रा पुत्रेण भार्यया |
दुहित्रा दानवर्णेण विवादं न समाचरेत ||

माता-पिता, दामाद, भाई, पुत्र, पत्नी, बेटी और सेवकों के साथ शत्रुता मोल लेना उचित नहीं है|

सौजन्य – चन्दामामा नवम्बर १९८२

कृपणेन नमो दाता न कश्चित् भुवि विद्यते |
अस्पृशन्नेव वित्तानि यः परेभ्यः प्रयच्छति ||

लोभी से बढकर कोई दाता इस लोक में न होगा| दाता तो अपने हाथ से दान देता है, पर लोभी धन को छुए बिना ही दूसरों के हाथ कर देता है|

सौजन्य – चन्दामामा अगस्त १९८२

पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम् |
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ||

पुस्तकीय ज्ञान उस वक्त काम नहीं देता जब निजी पांडित्य का प्रदर्शन आवश्यक हो| इसी प्रकार उधार का धन भी वक्त पर काम नहीं देता| अतः दोनों ही व्यर्थ हैं|

सौजन्य – चन्दामामा जुलाई १९८२

ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः |
पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु ||
पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा |
आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः ||
नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे |
वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः ||
भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा |
संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः ||
ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः |
सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः ||
रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु |
जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च ||
डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः |
हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः ||
पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः |
मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा ||
महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा |
वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा ||

इस आनंददायक कवच का प्रतिदिन पाठ करने से प्रत्येक विपत्ति में सुरक्षा प्राप्त होती है| यदि योग्य गुरु के निर्देशन में इस कवच का अनुष्ठान सम्पन्न किया जाए तो साधक सर्वत्र विजयी होकर यश, मान, ऐश्वर्य, धन, धान्य आदि से पूर्ण होकर सुखमय जीवन व्यतीत करता है|

नीचाश्रयो न कर्तव्यः, कर्तव्यों महदाश्रयः |
ईशाश्रयी महानागः, पप्रच्छ गरुडं सुखं ||

क्षुद्र व्यक्तियों के आश्रय में जाने के बदले शक्तिशाली लोगों के आश्रय में जाना कहीं उत्तम है| शिवजी के आश्रय में जानेवाला सर्प गरुड़ जैसे शक्तिशाली पक्षी से उसके कुशलक्षेम पूछ कर उसका अपमान कर सका|

सौजन्य – चन्दामामा जून १९८२

ललितांतानि गीतानि, कुवाक्यांतं तु सौहृदम् |
प्रणामांतः सतां क्रोधः, याचनांतं हि गौरवम् ||

जब तक गीत कर्ण मधुर होता है, तभी तक उस का महत्व है| जब तक कठिन वाक्य नहीं बोलते, तभी तक मित्रता बनी रहती है| उत्तम व्यक्तियों का क्रोध एक बार प्रणाम कराने मात्र से शांत हो जाता है, मनुष्य का तब तक आदर होता है जब तक वह किसी से याचना नहीं करता|

सौजन्य – चन्दामामा मई १९८२